घर आ गया

सोचा नहीं था, इस भाषा में दोबारा उतर पाऊँगा। मगर, अगर सोचा गया ही होने लगे तो ना रंज रहेगा, ना रस। रंज का वियोग सहनीय है, रस का नही। बहरहाल, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ, बिना सोचे समझे एक रास्ते पर पैर रख दिए हैं, चल भी पड़ा हूँ। साफ़ कुछ दिखाई नहीं […]

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