Worth it?

एक तिराहे पर दो सेकंड रुकना हुआ, आधी नींद में था। आँख की एक झपक के बीच ही कई छोटे दृश्य दिखे।

पहले में एक आदमी अपनी पत्नी को साइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठा कर काम पर जा रहा था, दोनो शायद एक ही जगह काम करते होंगे। पत्नी अपनी दोनो टांगो को एक तरफ किये बैठी थी, टांगें ज़मीन को लगभग छूते हुए, सीट को दोनो हाथो से पकडे हुए। काफी धूप थी। तिराहे पर शायद पत्नी के पाँव से चप्पल निकल गयी, उसने पति को बोला होगा तो पति ने साइकिल रोक दी। जहाँ से मुझे दिखा, पति मुस्कुरा रहा था। मैं होता तो शायद मुझे गुस्सा आ जाता।

दूसरे में एक बाइक और एक साइकिल आपस में भिड़ गये, साइकिल वाला बाल बाल बचा, बुरी तरह चोट लगने से। बहरहाल, बच गया।

तीसरे में एक और औरत औटो की पीछे वाली सीट में बैठी हुई थी (“में” इसलिए कहा क्योंकि वो सीट ऐसी ही होती है जिस ‘पर’ बैठा नहीं जाता, जिस ‘में’ बैठा जाता है)। काम पर जा रही होगी, बिन फ़िक्र किये कि चेहरा tan होगा या कमर।

चौथी तरफ मैं था, औटो में अधसोया बैठा हुआ, सोचते हुए, जो कितने दिनो से सोच रहा हूँ। सोचता ही जा रहा हूँ। यही कि is it worth it?

घर आ गया

सोचा नहीं था, इस भाषा में दोबारा उतर पाऊँगा। मगर, अगर सोचा गया ही होने लगे तो ना रंज रहेगा, ना रस। रंज का वियोग सहनीय है, रस का नही। बहरहाल, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ, बिना सोचे समझे एक रास्ते पर पैर रख दिए हैं, चल भी पड़ा हूँ। साफ़ कुछ दिखाई नहीं देता पर मौसम सुहाना है। कुछ समय तो ज़रूर बिताऊंगा। वही समय जिसने “मेरी भाषा” को “इस भाषा” कर दिया।

अतिशोय्क्ति तो लगेगी, हर कोई यही कहता है- नानी का घर, बरगद का पेड़, पुरानी पतली गली। लेकिन मुझे भी यही सब कुछ याद आता है। वही नानी का घर, गोबर से लीपे हुए फर्श, चटाई, ताश, मामा का डर, वापस घर जाने का उत्साह, वापस जाते वक़्त नानी के दिए हुए पैसे। यही सब क्यों याद आता है? क्योंकि अपना है। हिंदी भी तो अपनी ही है। जाने ये कब हुआ पर आजकल नानी के घर जाना नहीं होता । बहुत दिन हो गये।

फिर वही समय। जैसे ही विराम आता है, समय को ढूंढने लगता हूँ। किसी पर तो दोष डालना है ना। डाल किसी पर भी दूँ, आईना तो रोज देखा ही जाता है। नहीं, रोज नहीं, शायद आज कई सालो बाद देखा है। अपराधबोध सा हुआ देखकर। जाने क्यों!

किसी पश्चाताप के चलते कोई संकल्प नहीं लेने वाला हूँ। बस लिख रहा हूँ जिससे लिखा हुआ आँखों के सामने रहे, आते जाते देख पाऊँ, पढ़ पाऊँ, याद रख पाऊँ कि कुछ ऐसा भी मौजूद है, प्रचलित है, बरकरार है। और ऐसा जो पसंद भी है। हमेशा था। शायद धूमिल हो गया था। पर हमेशा था। वैसे ही था जैसे वो शहर जिसमे बचपन बिताया था, वो लड़ाई जो बहनो से की थी और जिसे याद करके कभी भी मन उदास हो जाता है, वो क्षण जिसमें पहली बार लगा था कि माँ बाप शायद जिम्मेदारी उठाने लायक समझने लगे हैं, वो हर बात जो दोस्तों से बेहिचक कह दी जाती है, और वो सब पुराने गीतों सा, जो आज भी गुनगुनाये जाते हैं। हिंदी भी थी। और अब शायद हमेशा रहेगी। शायद।

घर आ गया। मन नहीं भरा। सड़क छोटी थी। वो सड़क भी घर ही सी प्रतीत होती थी वैसे। खैर, उस सड़क से जुड़ते हुए कई रास्ते देख आया हूँ। बस जब दोबारा जाऊं तो वहाँ कुछ लोग मिल जाएँ तो मज़ा आ जाये…

That’s 24 July

Keekimaria’s theory

of someone new but not like the rest

fall of hair

and fire from the waterside

twenty two was the count

red, the color

some moving text and learning

boring noon, leaving late

and a fall again,

living being this time

hurt, then upset

separation, hope

abrupt

the day was still on….